हुकुम डेविड लिंच को हिंदी में श्रद्धांजलि देने का आनंद कुछ और होगा। यह सिर्फ़ उनके जाने के बाद समझ आया की श्रद्धांजलि उनके लिए नहीं जो बीत गए बल्कि उनके लिए होती है जो बचे रह जाते हैं। और इसीलिए इस हिंदी में लिखी श्रद्धांजलि से हिंदी प्रदेश में लिंच के जगमग प्रकाश को पहुँचाने का आनंद अनूठा होगा। २ दिन पूर्व लिंच के निधन ने मुझे अवाक् छोड़ दिया है। "जिसका डर था वो हो गया!" इस दिन का आना कली युग के एक नए चक्र की शुरुआत सा महसूस हो रहा है। एक ओर मन कृतज्ञ हुआ जाता है यह जान कर कि वो इस समय तक हमारे साथ बने रहे। मैं इस समय की भावना को जितना हो सके समेटना चाहती हूँ , इसीलिए आज लिखना चाहती हूँ वो सब जो उनके होने और उनके जाने ने मुझे महसूस कराया : १. जो बचा है उसे समेट लो: एक आर्टिस्ट का कर्त्तव्य है एक काल से दूसरे काल तक, एक छोर से दूसरे छोर तक एक पुल बन जाना। सीख , सोच, संभावनाओं के पिटारे को अपनी छाती से लगा कर बचा लेना- सब विपदाओं के बावजूद। यदी आज हम अपने आस पास प्रेरणा का कोई भी स्त्रोत देखते हैं, उसकी याद खुद में समाहित कर लेना - शौक नहीं ज़रूरत है , ताकि प्रेरणा का स्त्रोत ...
कहने के लिए कुछ बात चाहिए कुछ कौतुहल, कुछ विचार चाहिए बहुत चुप रहे है इन दिनों कुछ लफ्ज़ अब उधार चाहिए। कविता दूर हैं कितने दिन हुए ! फिर कोई इम्तिहान चाहिए।
एटम बम के गढ़ में बैठा वो परमाणु इठलाता है, दिखाता है धौस, डराता है बस एक आँख के इशारे भर से। अक्लमंद समझता है की जैसे है बस वो ही सशक्त, सार्थक और सुरक्षित। किन्तु विस्फोट के बाद कोटि अणुओं के साथ मिलाता हुआ आलाप बिलबिलाता हुआ, चिथड़ो में कौतुहल के बीच पश्चाताप में झुलसता रोता भी है वो एटम बम का परमाणु। इस धरती की मौत के मातम में रहोगे तुम भी कलपते, अकुलाते अपने AC वाले घर में बैठे तुम्ही तो हो वो एटम बम के परमाणु।
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