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Showing posts from November, 2014

प्रतिबिम्ब

तुम सब  में मुझे मैं दिखती हूँ थोड़ी थोड़ी जैसे मेरी ही छवि आधी-अधूरी। मित्र या शत्रु नहीं तुम हो मेरे ही प्रतिबिम्ब। प्रेम रहा सब से और बैर भी जैसे अंतर्द्वंद बाहर छलक पड़ा हो और बाह्यमुखि ये आँखें आज भीतर झाँक रहीं हों।

यात्रा

AC के डिब्बे में बंद यात्रा जारी है कम्बल और चादर में सुरक्षित। इंजिन के धुएं और हवा की सरसराहट से दूर आरक्षित। बदलते शहरों के पकवान,  गुम सूरज के होने का एहसास भी गुल। की इस मंच के किरदार सब सोएं हैं या फिर अपनी स्मार्ट फ़ोन की स्क्रीन में खोएं हैं। वाकई, यह सफर नहीं सिर्फ transportation  है। शुक्र है की भारतीय रेल में AC  के डिब्बे आज भी कुछ कम  हैं !