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बक्से

छोटे कमरे की टांड पर रखा बक्सा कभी कभी खुलता था।   दिवाली की सफ़ाई या दादी के श्राद्ध पर खाने पर आयी पंडिताइन के लिए कोई लेन देन की साड़ी या किसी बेशकीमती चीज़ की खोज में जो उसमें नहीं मिलती थी।  मिलता था बस कोई कोरा ब्लाउज पीस, छोटी लड़की की उससे छोटी फ्रॉक, आधी बाह का स्वेटर, या एक नया नटंक बटुआ १ रूपए के करारे नोट के साथ।  मैं भी कभी बक्सा खोलती हूँ तो मिल जाता है कभी कोई चुटकुला कभी कोई तस्वीर या काम आने वाली  कुछ पंक्तियाँ।  मगर चाहे जो निकाल लो बक्सों की किस्मत में नहीं लिखा खाली होना वो हमेशा भरे होते हैं।   छोटे कमरों की टांड पर - लेटे; बक्से रहते हैं अगली सांस के इंतज़ार में।  

बबूल

मिट्टी के टीलों पर चढ़ते वक़्त   कई बार  तीखे बबूल के कांटे  चुभे हैं  चप्पलों के आर पार  पैरों के तले से बात करने पहुंचे हैं।  "मुआ यह कौन आया  बिन बुलाये  मेरे घर के निचले दरवाज़े से घुसने वाला  बड़ा ज़ालिम, चुभीला  निकाल फेंका उसे  हाय, दर्द!  कांटे ने काट लिया!" आज सालों बाद सीने में दर्द उभरा। मैंने भीतर झाँका तो  कितने कांटे  बैठे  थे  अंदर! इतने कि अब  मैं खुद  एक बबूल का पेड़ हूँ। 

Hello

9829099896 Is that still your number? On a clear day as I walked on the beach the digits struck me as if lightening. The last time I called was from a PCO booth and you hung up on me. Rings a bell? I am back in that booth today; for no particular reason and I hear that phone on the wall ringing incessantly. Can you please cut the damn phone! cuz I don't wanna hang up on you and I remember well it's your birthday.

हम दो

गुलाब गुलदस्ते तोहफ़े महंगे सस्ते नहीं, हम इन सब में नहीं पड़ते हैं हम बातें करते हैं। कभी गांव के पहाड़ की कभी बादल से दहाड़ की सड़क, कमीज़, मकान की न जाने क्या क्या करते हैं हम बातें करते हैं। बिना पीकू की साड़ी का रह रह धागा रिसता है ऐसे दाना दाना बातों का हर दिन आटा पिसता है। ऐसे बतियन की बाटिया हम अक्सर सेका करते हैं हम बातें करते हैं। और जब किसी बात पर ये बातें रुक जाती हैं हम खूब ज़ोर से लड़ते हैं बात बात पर अड़ते हैं और फिर से बातें करते हैं हम बस बातें करते हैं।  

Quarantina

Quarantina. That Spanish lady who dies in forty days has come visiting. "Stay put" she says, I've come to have a word about life & work family & friends feelings et al.. I stare at her face, gaping. Not believing the moment. Unreal! "Aah look at you bitch I want no bullshit" I scream. and keep the lady waiting while I Netflix and chill.

साधारण सी

यूँ तो अलसायी रहती हूँ मगर आज काफ़ी दिनों बाद कुछ पका रही हूँ। सामग्री: बारीक कटे विचार थोड़े सवाल, कुछ उद्गार अलंकार स्वादानुसार। एक एक कर कागज़ के पतीले में उँडेले और ख्यालों की मद्धम आंच पर सेंके। कलम की करछी से रह रह कर चलाती रही, कहीं लग न जायें! परोसने से पहले एक बार चखा ज़रूर बताओ कैसी लगी हुज़ूर?

कुछ दृश्य आंदोलन के

१९ दिसंबर को जब अगस्त क्रांति मैदान के लिए टैक्सी ली तो बूढ़े ड्राइवर ने कहा, " मगर वहां तो मोर्चा निकल रहा है"..  "जी वहीँ जाना हैं"  मैंने जवाब दिया और मन ही मन आश्चर्य किया की अब तक यह न मालूम था प्रोटेस्ट को हिंदी में मोर्चा कहते हैं, यह शब्द सुना बहुत और शायद अर्थ भी मालूम था मगर प्रोटेस्ट और मोर्चा शब्द को कभी साथ में नहीं देखा था. उसके बाद हमने कुछ बात नहीं की, हम करना ज़रूर चाहते थे.. मगर संकोच ज़बान पर ताला लगा कर अक्सर चाबी इधर उधर फ़ेंक जाता हैं, उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ.  मैदान भर गया था, सड़क पर जुलुस जारी था, हज़ारों की तादाद में लोग सड़क पर उतरे थे अपने अपने गुटों में लोग आज़ादी और इंकलाब के नारे लगा रहे थे. मैं चुप थी. एक दृष्टा बनकर उस मैदान की सैर की, मैंने अपने आप को समझा लिया था की काम छोड़ कर यहाँ तक आने का जो मैंने आभार अपने आप और अपने देश पर किया वो काफ़ी हैं और इस समय की ज़रूरत को पूरा करता हैं...तो लसलसी भीड़ में बहती हुयी मैं देख रही थी मोर्चे के अलग अलग रंग.  हज़ारो की भीड़ में जो उभरकर के दिख रहे थे वो थे पोस्टर और प्लेकार्ड